इस तरह सियाचिन बना भारत का हिस्सा, भारतीय सेना का सबसे ख’तर नाक मिशन

हमारी सुरक्षा के लिए हजारों सैनिकों बार्डर पर तैनात रहते है। दिन रात वो देश की सेवा में लगे रहते हैं। खास तौर पर सियाचीन पर। वो लोग वहां अपना परिवार और घर बार छोड़कर दिन रात देश की सेवा में लगे रहते हैं और चट्टान की तरह खड़े रहते हैं ताकि हम और आप चैन सो सकें। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वहां खड़े रहना सबसे मुश्किल काम है। ‌

इस सियिचिन के एक ग्लेशियर की एक तरफ पाकिस्तान है तो दुसरी तरफ चीन की सीमा। दोनों ही तरफ सेना को अलर्ट रहना होता है। आपको बता दें कि साल 1972 में जब शिमला समझौता हुआ था तो इस इलाके को बेजान और बंजर बताया गया था। वहीँ साल 1984 में जब भारत के खुफिया जानकारी मिली कि पाकिस्तान सियाचीन ग्लेशियर पर हम’ला करने के लिए अमेरिका से विशेष सुट बनवा रहा है।इसके बाद भारत को खुफिया जानकारी मिलते ही भारत ने उससे पहले ही जुते बनवा कर पाकिस्तान के इरादों को खत्म कर दिया था। इस आपेरशन ने का नाम आपरेशन मेघदूत रखा गया था। पाकिस्तान ने 25 अप्रैल 1984 को अपनी सेना सियाचीन भेजा लेकिन ख़राब मौसम और बिना तैयारी के वापस लौटना पड़ा। भारत की ओर से इसकी सुरक्षा के लिए 10,00 सैनिक तैनात रहते हैं।

पाकिस्तान ने जब 1984 में हमला किया था। खराब मौसम के कारण उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा था। ‌इस ग्लेशियर के उपरी हिस्से पर भारत का कब्जा है। भारत इस सियाचीन की सुरक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च करते हैं। ‌सियाचिन ग्लेशियर पांच फडै ग्लेशियर में सबसे बड़ा विश्व का दुसरा बड़ा ग्लेशियर है। समुद्र तल से 17770 फिट की उंचाई पर मौजूद हैं।सैनिकों की नियुक्ति 180000 फिट से लेकर 230000 फिट तक रहती है। इसके अलावा यहां पर आक्सीजन की आपूर्ति उच्चाई के कारण 30 प्रति शत रहती है। यहां का ताप मान माइनस 55 तक गिर जाता है।

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